हम आधुनिक हो गए... क्या हम अनपढ़ ही ठीक नहीं थे?
आज जब हम खुद को आधुनिक कहते हैं, स्मार्टफोन चलाते हैं, सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं, और हर चीज़ को "साइंटिफिक" दृष्टिकोण से देखते हैं, तो क्या वाकई हम ज्यादा समझदार हो गए हैं? या फिर हमने कुछ ऐसा खो दिया है जो हमारी जड़ों से जुड़ा था?
हमारी पुरानी पीढ़ियाँ भले ही स्कूल-कॉलेज न गई हों, लेकिन उनके पास एक ऐसा अनुभवजन्य ज्ञान था जो उन्हें प्रकृति, जीवन और समाज के साथ जोड़ता था। वो कहावतें, नसीहतें और परंपराएं जिन्हें हम अब 'बेक़ार की बातें' कहकर टाल देते हैं — क्या वाकई वो बिना मतलब की थीं?
हमारे घर की दादी या नानी कहा करती थीं:
- “नल धीरे खोलो, नहीं तो पानी बदला लेगा।”
- “खाना नाली में मत डालो, नहीं तो नाली के कीड़े बनोगे।”
- “गाय को जूठा मत दो, वह गौ माता है।”
- “तुलसी को सुबह जल चढ़ाओ, और उसे छूने से पहले हाथ धो लो।”
- “चिड़ियों के लिए रोज दाना-पानी रखना पुण्य का काम है।”
- “पीपल को जल चढ़ाने से पितरों को शांति मिलती है।”
- “आवला अमृत है, इसे नियमित खाओ।”
- “धूप-अगरबत्ती रोज जलाओ, इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।”
आज जब हम तथाकथित आधुनिकता की दौड़ में हैं, तो इन बातों को ‘अंधविश्वास’ कहकर टाल देते हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि यही छोटी-छोटी बातें हमें प्रकृति से जोड़ती थीं? यही परंपराएं थीं जो हमें सिखाती थीं कि:
- हम पानी को व्यर्थ न बहाएं।
- हम पशु-पक्षियों की भूख-प्यास का भी ध्यान रखें।
- हम भोजन का अपमान न करें।
- हम हर दिन कुछ ऐसा करें जिससे हमारा पर्यावरण संरक्षित हो।
आज हमारे पास बहुत कुछ है — मोबाइल, इंटरनेट, कार, एयर कंडीशनर, लेकिन क्या हमारे पास सुकून है? क्या हमारे पास वो आत्मिक संतुलन है जो पहले होता था? हम एक ओर डिजिटल बन रहे हैं और दूसरी ओर धीरे-धीरे संवेदनहीन।
हमने आधुनिकता को आत्ममूल्य से ऊपर रख दिया है। अब पेड़ लगाना कोई धार्मिक काम नहीं, बल्कि सिर्फ सरकारी योजना बन गया है। गाय अब 'पालने योग्य' नहीं रही, और तुलसी का पौधा अब सिर्फ बालकनी की शोभा बन गया है।
हमारे बुजुर्ग जब कहते थे — “श्रुति शास्त्रों की आवाज़ हैं, इन्हें सुनो,” तो वो हमें अंधविश्वास नहीं, एक जीवनशैली दे रहे थे। एक ऐसी जीवनशैली, जिसमें प्रकृति, संस्कृति और मानवीयता का अद्भुत संतुलन था।
आज जब हम पर्यावरण दिवस पर भाषण देते हैं, वनों की कटाई का रोना रोते हैं, प्लास्टिक मुक्त जीवन की बात करते हैं — तब कहीं न कहीं हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारी पिछली पीढ़ी, जो "अनपढ़" कहलाती थी, असल में ज्यादा "समझदार" थी।
उन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े थे, लेकिन जीवन के सूत्र उन्हें ज़ुबानी याद थे।
आज हमारा बच्चा मोबाइल पर पेड़ की तस्वीरें देखता है, लेकिन असली पीपल का पेड़ नहीं पहचानता। वह गाय को केवल कॉमिक्स में देखता है, उसके पास बैठकर रोटी नहीं खिलाता।
हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा — क्या हम वाकई आगे बढ़े हैं? या हमने पीछे जो छोड़ा, वह कहीं ज़्यादा मूल्यवान था?
अब आवश्यकता है उस खोई हुई विरासत को फिर से अपनाने की। जरूरत है बच्चों को किताबों के साथ-साथ जड़ों से जोड़ने की। और जरूरत है उस “पुरानी समझदारी” को फिर से आधुनिक जीवन में जगह देने की, जो हमारे पूर्वजों ने बिना डिग्री के अर्जित की थी।
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क्या आपको लगता है कि हमने अपनी परंपराओं को छोड़कर गलती की है? क्या हम फिर से प्रकृति और संस्कृति से जुड़ सकते हैं? आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? कृपया नीचे कमेंट करें और अपने विचार साझा करें।
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Ek dm sahi baat likhi hai ap n
जवाब देंहटाएंAp ki lekhni apna kaam kr rhi lunchbox ki tarah
आपकी सोच मेरे लेख से जुड़ पाई, ये मेरे लिए बड़ी बात है 💐
जवाब देंहटाएंसवाल उठाना ही बदलाव की शुरुआत है, जुड़े रहिए 🌺
"आपका ब्लॉग बहुत दिल को छू गया… कितनी सच्चाई है हर एक शब्द में!"
जवाब देंहटाएंप्रेरित करने हेतु आभार आपका 🌹🌹
हटाएंसराहनीय और उत्तम लेख
जवाब देंहटाएंआपका आभार 🙏
हटाएंअगर मेरी लेखनी किसी एक को भी सोचने पर मजबूर करे, तो ये प्रयास सार्थक है। ऐसी प्रेरणा देते रहिए 💖
Lalit Pant
जवाब देंहटाएंBahut achi baat likhi h
जवाब देंहटाएंधन्यवाद 🌺🌺
हटाएं"कभी-कभी लगता है हम पहले जैसे ही रहते तो बेहतर था… ये लेख सोचने पर मजबूर करता है।"
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत धन्यवाद 🌸
जवाब देंहटाएंसच की कड़वाहट जब शब्दों में उतरती है, तो पाठक का दिल छू जाती है। आपके भाव मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं 🙏