"जब शिक्षा से पहले पेट भरना जरुरी हो "

 पढ़ाई से पहले रोटी – जब शिक्षा से पहले पेट भरना ज़रूरी हो जाता है

एक बार एक सर्वे के दौरान मैं एक गाँव के सरकारी स्कूल पहुँची। वहाँ बच्चों से बातचीत करते हुए एक छोटा बच्चा मेरी नज़रों में ठहर गया। उसका नाम रमेश था — सूखे गाल, नंगे पाँव, और एक पुरानी कॉपी और पेंसिल हाथ में। मैंने मुस्कराकर पूछा, “तुम्हारा मन पढ़ाई में लगता है?”

उसने तुरंत सिर हिलाया, “बहुत लगता है मैडम जी। पर पहले रोटी मिल जाए, तभी पढ़ाई हो पाती है।”

उसके इन शब्दों ने मुझे भीतर तक हिला दिया।

हम जब 'शिक्षा का अधिकार' की बात करते हैं, 'डिजिटल इंडिया' और 'नई शिक्षा नीति' की चर्चा करते हैं — तो क्या हमें यह याद रहता है कि आज भी लाखों बच्चे ऐसे हैं, जिनकी प्राथमिकता किताबें नहीं, दो वक़्त की रोटी है?

हमारे देश में कई ऐसे बच्चे हैं जो स्कूल तो आते हैं, पर खाली पेट। उनकी जेबों में पेंसिल नहीं, अधूरी रोटी होती है। क्लास में ध्यान भटकता है क्योंकि पेट में भूख है। मिड-डे मील उनका एकमात्र संपूर्ण भोजन होता है।

रमेश की माँ खेतों में मज़दूरी करती है, और पिता कहीं दूर ईंट-भट्टे पर काम करते हैं। रमेश सुबह अपने छोटे भाई को संभालकर स्कूल आता है। कई बार वो बिना नाश्ता किए सीधे चला आता है, ताकि मिड-डे मील मिल जाए। उसकी मासूम आंखों में पढ़ने की ललक थी, पर हर शब्द के पीछे भूख का दर्द छुपा था।

मैंने रेलवे क्रॉसिंग पर, ट्रैफिक सिग्नल पर न जाने कितनी बार मासूम बच्चों को पेन, फूल, झाड़न, खिलौने बेचते देखा है। कुछ की उम्र तो शायद स्कूल जाने की भी नहीं होती। धूल से भरे चेहरे, तपती सड़कों पर नंगे पाँव — पर आँखों में चमक होती है, उम्मीद की किरण। जब ऐसे बच्चों को देखती हूँ तो मन बार-बार यही कहता है — क्या इनका बचपन इसी फुटपाथ पर बीतेगा? क्या इनके हाथों में कभी किताब होगी? क्या इनकी भूख, इनकी मेहनत से बड़ी हो गई है?

क्या हम ऐसे बच्चों के लिए कुछ कर सकते हैं?

मैं अक्सर सोचती हूँ — शिक्षा से पहले भोजन की व्यवस्था क्यों न हो? क्यों न हम समाज के रूप में यह सुनिश्चित करें कि हर बच्चा पहले संतुष्ट पेट लेकर स्कूल आए, ताकि वह पूरी ऊर्जा से पढ़ सके? क्योंकि भूखा बच्चा कुछ भी सीख नहीं सकता।

आज रमेश तो स्कूल में है, पर लाखों रमेश स्कूल से बाहर हैं — रोटी के पीछे भागते हुए।

मैं ईश्वर से यही दुआ करती हूँ — मुझे इतना अवसर और संबल देना कि मैं किसी एक ‘रमेश’ की भूख मिटाकर उसकी पढ़ाई की राह आसान कर सकूँ।


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